लिव इन रिलेशनशिप भारतीय समाज में कितना सही बैठता है।
मनुस्मृति के अनुसार हिन्दूओं में विवाह संस्कार 8 प्रकार के बताये गये हैं, भौतिकतावादी इस युग में लिव इन रिलेशनशिप नामक एक नया प्रकार जुड़ गया है। इसका जन्म क्यों और किन परिस्थितियों में हुआ यह बता पाना कठिन है.
परंतु सवाल उठता है कि क्या यह सामाजिक व्यवस्था को बनाये रख पाने में सक्षम होगा या इसके कारण सामाजिक व्यवस्था आहत होगी।
सामाजिक विषयों का अध्ययन करने वाले मानते हैं कि यह महानगरीय सभ्यता की देन है, लड़के लड़कियां अपने घर से दूर शिक्षा और रोजगार की तलाश में महानगर की ओर रूख करते हैं। घर परिवार से दूर अपनी तन्हाई मिटाने के लिए इनमें दोस्ती का रिश्ता जन्म लेता है और फिर दोनों साथ रहने लगते हैं। साथ साथ रहते रहते इनमें पति पत्नी की तरह का सम्बन्ध कायम हो जाता है। दूसरी ओर वैवाहिक जीवन कि जिम्मेवारियों और जवावदेही से बचने के लिए भी इन दिनों युवा इस सम्बन्ध की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह ऐसा सम्बन्ध है जिसमें लड़के और लड़कियां दोनों ही अपनी जिन्दग़ी अपनी पसंद से अपनी आज़ादी से जीते हैं, कोई किसी के लिए जवाबदेह नहीं होता।
इस दिशा में लड़के पहल करते हैं यह कहना एक तरफा फैसला होगा, वास्तव में आज सामाजिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हो रहा है। लड़कियों की महत्वाकांक्षा एवरेस्ट की शिखर को पार करने लगी है, वे नहीं चाहतीं है कि उनके पैरों में पति और ससुरल की बेड़ी पड़े। करियर को लेकर इनके मन में अज़ब सी हचलल बनी रहती है, ऐसे मे परिवार को वक्त दे पाना इन्हें मुश्किल लग रहा है। युवाओं की इस मानसिकता ने डिंक्स नामक नया शब्द भी सामाजिक शब्दकोष में शामिल किया है जिसका अर्थ है डबल इन्कम नो किड्स।
पति पत्नी के तौर पर रहते हुए 100 फीसदी में से 50 फीसदी संतान को जन्म देते हैं। संतान के जन्म के बाद जब जिम्मेवारी बढ़ती है तो इस रिश्ते की कामयाबी पर प्रश्न उठने लगता है और प्रश्न उठता है कि ऐसी संतान को क्या कहा जाय। यूरोपीय देशों में भले ही इस तरह की संतान को जायज कहा जाता हो लेकिन भारतीय समाज में इन्हें नाजायज ही करार दिया जाता है। ऐसे बच्चों के हितों को सुरक्षित करने हेतु सर्वोच्च न्यायालय ने महान फैसला दिया है। अब ऐसे बच्चे नाजायज नहीं होंगे। सर्वोच्च न्यायालय में जस्टिस अरिजीत पसायत की अध्यक्षता वाली खंड पीठ ने लिव इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाली संतान के हक में फैसला देते हुए कहा है कि इस सम्बन्ध से उत्पन्न संतान को नाजायज करार नहीं दिया जा सकता। सवाल उठता है कि क्या संतान को जायज बना देना मसला का समाधान है, आखिर अपनी स्वच्छंदता की चाहत में परिवार और सामाजिक व्यवस्था को ठेंगा दिखना युवाओं को शोभा देता है। अपने शौक और आनन्द के लिए युवा भविष्य को किस दिशा में ले जा रहे हैं क्या इस पर गौर करना चाहिए अथवा नहीं, जरा सोच कर देखिएगा।




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