दास्ताने मीना कुमारी
मीना कुमारी (Meena Kumari) की यादगार फिल्म: परिणीता (Parineeta (1953), आजाद ( Azaad (1955), एक ही रास्ता (Ek hi Raasta (1956), नया अंदाज (Naya Andaaz (1956), मिस मैरी (Miss Mary (1957), यहूदी (Yahudi (1958),
मीना कुमारी (Meena Kumari) भले ही आज दुनियां में नहीं हैं लेकिन अपनी यादगार फिल्मों के कारण आज भी दर्शकों के दिल में सांस ले रही हैं. मीना कुमारी (Meena Kumari) अपनी अदाकारी से अपने चरित्र को जीवन प्रदान कर देती थीं, तो इनकी आवाज़ नसों में झनझनाहट पैदा कर देती थीं. अपनी अदाकारी और दर्द भरी आवाज़ के कारण मीना कुमारी(Meena Kumari) अपने दौर में हर दिल अज़ीज रही. इसे महान अदाकारा की बदनसीबी ही कह सकते हैं कि दर्जनों सफल फिल्में देने के बावजूद भी इन्हें ट्रेजडी क्वीन का ही खिताब दिया गया. परिणीता में मीना कुमारी (Meena Kumari) का काम करना इनका सौभाग्य था या दुर्भाग्य, कह नहीं सकते, फिल्म सफल रही परंतु इस फिल्म के साथ ही इन्हें ट्रेजडी क्वीन का ठप्पा मिला था.
मीना कुमारी (Meena Kumari) का जन्म 1932 में एक मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ था. पिता अली बख्स पारसी थियेटर में काम करते थे और मां इकबाल बेगम एक नर्तकी थीं. आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण स्कूल से अधिक दिनों तक नाता नहीं रहा और महजबीन बानो यानी मीना कुमारी (Meena Kumari) को महज 7 साल की उम्र में फिल्मों में काम करना पड़ा. विजय भट्ट की फिल्म लेदर फेस (1939) में आयी थी जिसमें मीना कुमारी (Meena Kumari) ने बतौर बाल कलाकार (बेबी मीना -विजय भट्ट द्वारा दिया गया नाम) ने काम किया था. बाल कलाकार के रूप में कुछ फिल्में मीना ने किये परंतु इससे इन्हें कोई पहचान नहीं मिली.
विजय भट्ट की फिल्म बैजू बाबरा (1952) में पर्दे पर आयी इस फिल्म से बतौर अभिनेत्री मीना कुमारी (Meena Kumari) को पहचान मिली. फिल्म में दमदार अभिनय के लिए मीना कुमारी (Meena Kumari) को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला. इसी वर्ष मीना ने निर्देशक कमाल अमरोही से निकाह कर लिया. कमाल के साथ इन्होंने दायरा (Daera (1953), एक ही रास्ता (Ek Hi Rasta (1956), शारदा (Sharda (1957) और दिल अपना और प्रीत पराई (Dil Apna Aur Preet Parayi (1960) में काम साथ साथ काम किया. कमाल के साथ मीना की अतिम फिल्म पकीज़ा (Pakeezah 1972) रही.
मीना अपने काम से जिस कदर आगे बढ़ती रही कमाल के साथ इनका रिश्ता उतना ही कमजोर होता गया और पकीजा फिल्म के दौरान ही दोनों अलग हो गये. यह इनकी अतिम फिल्म रही.इस ट्रेजडी क्वीन के असल जीवन में भी दर्द ने इनका साथ नहीं छोड़ा कमाल से तलाक के बाद मीना शराब में डूब गयी और 1972 में यह चांद रूपहले पर्दे पर अपनी चांदनी बिखराकर हमेशा के लिए दुनियां से रूख्सत हो गयीं. और छोड़ गयी अपनी यादों यादगार फिल्में.
मीना कुमारी (Meena Kumari) की यादगार फिल्म: परिणीता (Parineeta (1953), आजाद ( Azaad (1955), एक ही रास्ता (Ek hi Raasta (1956), नया अंदाज (Naya Andaaz (1956), मिस मैरी (Miss Mary (1957), यहूदी (Yahudi (1958), शरारत (Shararat (1959), कोहीनूर (Kohinoor (1960), भाभी की चूड़ियां (Bhabhi ki Chudiyaan (1961), आरती (Aarti (1962), साहब बीवी और गुलाम (Sahib Bibi Aur Ghulam(1962 ), दिल एक मन्दिर ( Dil Ek Mandir (1963) , चित्रलेखा (Chitralekha 1964 ), सांझ और सवेरा ( Saanj Aur Savera(1964), काज़ल (Kajal (1965) , फूल और पत्थर (Phool Aur Pathar (1966), बहू बेग़म (Bahu Begum (1967), मेरे अपने(Mere Apne(1971) और पाक़ीजा (Pakeezah (1972). गोमती के किनारे (1972) मीना की अंतिम फिल्म रही.
1962 मीना के जीवन में अहम वर्ष रहा इस वर्ष मीना की आरती, मैं चुप रहूंगी और साहेब बीवी और गुलाम ने तहलका मचा दिया इन तीनों फिल्मों में अलग अलग श्रेणियों के लिए मीना को फिल्म फेयर के लिए नामित किया गया. साहेब बीवी और गुलाम में मीना ने जिस तरह छोटी बहू के किरदार को पर्दे पर उतार दिया वह अपने आप में बेमिसाल है. इस फिल्म में पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे दर्शकों को आह भरने पर मजबूर कर देता है.




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