बलराज साहनी रूपहले पर्दे के चमकते सितारे
1953 में दो बीघा जमीन (Do Bigha Zamin) ज़मीन पर्दे पर आई जिसका निर्देशन विमल रॉय (Vimal Roy) ने किया था.इस फिल्म में शम्भू रिक्शे वाले की भूमिका में जिस तरह बलराज ने वास्तविक जिन्दग़ी को पर्दे पर उतार दिया उसकी कल्पना स्वयं निर्देशक विमल रॉय को भी नहीं थी.
बलराज साहनी (Balraj Sahni) का जन्म अविभाजित भारत के रावलपिंडी शहर में हुआ था जो वर्तमान में पाकिस्तान में पड़ता है. इस शहर के मध्यमवर्गीय व्यवसायी परिवार में 1 मई 1913 को इनका जन्म हुआ था. इन्होंने लाहौर के सरकारी कालेज से अंग्रेजी विषय में स्नात्कोत्तर की शिक्षा पूरी की. शिक्षा पूरी हो जाने पर बलराज साहनी अपने पिता के घर रावलपिंडी लौट आये और व्यवसाय में अपने पिता का हाथ बंटाने लगे. परंतु यह इंसान व्यापार करने के लिए पैदा नहीं हुआ था इनकी मंजिल तो कहीं और थी. इनमें बचपन से ही लेखन और अभिनय का शौक था.
अपने शौक के कारण 1930 में अपनी पत्नी दमयंती के साथ बलराज साहनी (Balraj Sahni) रविन्द्रनाथ टैगोर के शंति निकेतन में आ गये, यह पर इन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी के शिक्षक के रूप में बच्चों को शिक्षा प्रदान किया. 1936 में बलराज की पहली पुस्तक प्रकाशित हुई जिसका नाम था "शहजादों का ड्रिंक" . इसके बाद बलराज साहनी ने बी बी सी लंदन के हिन्दी उद्धोषक के रूप में काम किया और साथ ही दिल्ली के मंडे मार्निग जर्नल के लिए भी अपनी सेवाएं दीं.
बलराज साहनी पर महात्मा गांधी का बहुत प्रभाव था, जिससे ये महात्मा गांधी के साथ भी स्वतंत्रता की लड़ाई में सहभागी रहे.
पात्र में जान लाने के लिए इन्होंने कोलकाता में अपने हाथों से रिक्शा खींचा और हाथ रिक्शा वालों की जिन्दग़ी को करीब से जाना. इनकी मेहनत रंग लायी और यह फिल्म इनकी यादगार फिल्म बन गयी. इसे फिल्म को अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया.
बचपन से अभिनय के प्रति लगाव के कारण बलराज इप्टा (IPTA) से जुड़ गये. यहां इन्हें फणी मजूमदार के नाटक इंसाफ (1946) में काम करने का पहला मौका मिला. इसी वर्ष बलराज को ख्वाज अहमद अब्बास की फिल्म धरती के लाल में काम करने का मौका मिला. इप्टा में काम करते हुए बलराज पर क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट विचारों का उद्गम हुआ जिसके कारण इन्हें जेल भी जाना पड़ा. इन दिनों इनकी फिल्म हलचल (1951) की शूटिंग हो रही थी, दिन को बलराज शूटिंग करते और रात को जेल में रहते, शूटिंग के दौरान इनपर पुलिस का पहरा रहता. जिया सरहदी की फिल्म हमलोग (1951) से बतौर अभिनेता बलराज को पहचान मिली.
1953 में दो बीघा जमीन (Do Bigha Zamin) पर्दे पर आई जिसका निर्देशन विमाल रॉय (Vimal Roy) ने किया था. इस फिल्म में शम्भु रिक्सेवाले की भूमिका में जिस तरह बलराज ने वास्तविक जिन्दग़ी को पर्दे पर उतार दिया उसकी कल्पना स्वयं निर्देशक विमल रॉय को भी नहीं थी. पात्र में जान लाने के लिए इन्होंने कोलकाता में अपने हाथों से रिक्सा खींचा और रिक्सावालों की जिन्दग़ी को करीब से जाना. इनकी मेहनत रंग लायी और यह फिल्म इनकी यादगार फिल्म बन गयी. इसे फिल्म को अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया.
दो बीघा ज़मीन के बाद इन्होंने 1955 में गर्म कोट, 1960 में अनुराधा और 1961 काबुलीवाला में काम किया. काबुलीवाला में जिस तरह की अदाकारी दिखायी उसने दर्शक का दिल जीत लिया. बलराज ने उन दिनों की लगभग सभी जानी मानी नायिकाओं के साथ काम किया जिनमें नर्गिस के साथ (लाजवंती और घर संसार 1958), वैजंतीमला के साथ (कठपुतली 1957) मीना कुमारी के साथ (सट्टा बाज़ार 1959), भाभी की चूड़ियां 1961), में नूतन के साथ (सीमा 1955) और (सोने की चिड़िया 1958) में पर्दे पर आयी इन फिल्मों से नायक के तौर पर बलराज ने खूब वाहवाही लूटी. इस फिल्मों के बाद इन्होंने चरित्र अभिनेता के तौर पर इन्होंने हक़ीकत, वक्त, दो रास्ते, एक फूल दो माली व मेरे हमसफर में काम किया. 1957 में प्रदर्शित फिल्म लाल बत्ती में बलराज ने निर्देशक के तौर पर भी आपने आपको प्रस्तुत किया.
बलराज साहनी की अंतिम सफल फिल्मों में से एम एस सत्यु M. S. Sathyu द्वारा निर्देशित फिल्म गर्म हवा है जो 1973 में पर्दे पर आयी. इस फिल्म में बलराज एक जूता व्यवसायी बने थे. बंटवारे के समय इसके मन:स्थिति को इस फिल्म में दिखाया गया है।
अभिनय में व्यस्त रहने के बावजूद बलराज का कलम प्रेम कभी कम नही हुआ, जब भी मौका मिला इन्होंने अपनी लेखनी चलाई 1959 में इन्होंने मेरा रूसी सफरनामा लिखी और 1960 में मेरा पाकिस्तान सफरनामा. 1951 में प्रदर्शित बाजी फिल्म बलराज साहनी की लेखनी से लिखी गयी है, इसकी पटकथा भी बलराज ने लिखी है और निर्देशन किया गुरूदत्त ने.
बलराज का चरित्र विविधताओं से भरा है, इनके जीवन में हर रंग मिलता है. इनके अंदर का रंग श्वेत श्याम फिल्म से लेकर रंगीन फिल्मों में भी दृष्टिगोचर होता है.




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